जसवंतनगर (संवाददाता : पंकज राठौर)। पर्यूषण पर्व एवं दशलक्षण महापर्व के अंतिम दिन शुक्रवार को अनंत चतुर्दशी के पावन अवसर पर नगर के श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर में श्रद्धा और भक्ति का माहौल रहा। दशलक्षण विधान के तहत श्रद्धालुओं ने उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म की विधिवत आराधना की। सुबह मंदिर में भगवान का अभिषेक और शांतिधारा कर श्रद्धालुओं ने विश्व शांति, सुख-समृद्धि और आत्मकल्याण की कामना की।
शांतिधारा के सौधर्म इंद्र बनने का सौभाग्य श्रावक श्रेष्ठी अमीर चंद्र शोभा जैन, डीएसपी प्रयांक जैन, शिखा जैन एवं नेत्रा जैन परिवार को प्राप्त हुआ। विधि-विधान के साथ शांतिधारा के बाद श्रद्धालुओं ने विशेष पूजा-अर्चना की। अनंत चतुर्दशी के अवसर पर जैन समाज के लोगों ने व्रत, उपवास और संयम के नियमों का पालन करते हुए धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लिया।
इस अवसर पर भगवान वासुपूज्य के निर्वाण कल्याणक महोत्सव का भी आयोजन हुआ। श्रद्धालुओं ने भगवान वासुपूज्य को निर्वाण लाडू अर्पित कर भक्तिभाव से पूजन किया। मंदिर में सामूहिक रूप से पूजा-अर्चना और धार्मिक विधान संपन्न हुए। पूरे कार्यक्रम के दौरान मंदिर परिसर भगवान के जयकारों और धार्मिक भजनों से गूंजता रहा।
आत्मा में रमण करना ही ब्रह्मचर्य : भावसागर
मुनि श्री 108 भावसागर जी महाराज ने उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म पर प्रवचन देते हुए कहा कि आत्मा में रमण करने वाले को ब्रह्मचारी कहा जाता है। ब्रह्मचर्य केवल बाहरी संयम का नाम नहीं है, बल्कि विषय-वासनाओं से मन को हटाकर अपनी आत्मा की ओर लौटने और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने का मार्ग है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को जीवन में सदाचार, संयम और मर्यादा को अपनाना चाहिए। सभी जीवों के प्रति करुणा, मैत्री और उदारता का भाव रखना चाहिए। भारतीय संस्कृति और जैन धर्म की अहिंसा, संयम एवं सदाचार की परंपरा का स्मरण कराते हुए उन्होंने ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना के साथ जीवन जीने का संदेश दिया।
मुनि श्री ने कहा कि दशलक्षण महापर्व आत्मशुद्धि और आत्मचिंतन का अवसर है। इन दस दिनों में मनुष्य को अपने भीतर मौजूद विकारों को पहचानकर उन्हें दूर करने का प्रयास करना चाहिए। उत्तम ब्रह्मचर्य का भाव व्यक्ति को आत्मसंयम, आत्मशुद्धि और आत्मकल्याण की ओर ले जाता है।
